क्या आपकी सैलरी में GST शामिल है? सैलरी स्लिप, TDS और GST का पूरा गणित

अगर आपका इनकम सैलरी से आता है तो आपको जानना जरूरी है कि आपकी कमाई पर असल में कौन सा टैक्स लगता है और क्यों आपकी सैलरी GST के बाहर है।

​सैलरी पर GST क्यों नहीं लगता? बहुत से लोगों को ​यह सबसे बड़ी भ्रम है कि जीएसटी हर तरह की इनकम पर लगता है, लेकिन सच्चाई यह है कि आपकी सैलरी (वेतन) पर GST नहीं लगता है, TDS लगता है।

GST अधिनियम, 2017: GST (वस्तु एवं सेवा कर) सिर्फ वस्तुओं (Goods) और सेवाओं (Services) करने (Supply) पर लगता है।

जब आपकी सैलरी न तो वस्तु है और न ही जीएसटी में सप्लाई है इसलिए सैलरी पर जीएसटी नहीं लगता, अब इसमें और बहुत सारी बातें आती है इनको विस्तार से नीचे से समझे।

सैलरी स्लिप का असली टैक्स कौन? (TDS vs GST)

अब आपका मन में सवाल होगा अगर सैलरी पर जीएसटी नहीं लगता, तो सैलरी स्लिप से कौन सा टैक्स कटता है? एक टेबल से समझे:

टैक्स का प्रकारसैलरी से संबंधअसली कानून
आयकर (Income Tax)असल टैक्स: आपकी पूरी सालाना इनकम पर लगता है, टैक्स स्लैब के अनुसार।आयकर अधिनियम, 1961
TDS (Tax Deducted at Source)कटौती: यह आपकी इनकम पर लगने वाले आयकर का एक हिस्सा है, जिसे आपके नियोक्ता (Employer) आपकी ओर से काटकर सरकार के पास जमा करता है।आयकर अधिनियम, 1961
GST (Goods & Services Tax)कोई संबंध नहीं: यह वस्तुओं या सेवाओं की बिक्री या खरीद पर लगता है, सैलरी पर नहीं।जीएसटी अधिनियम, 2017

कुल मिलाकर बात यह है कि सैलरी स्लिप में जो कटौती दिखती है, वह आयकर की ओर जाती है, टीडीएस के नाम से।

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सैलरी पर GST लगने के अपवाद

कुछ ऐसी समय होती हैं जहाँ नियोक्ता और कर्मचारी के बीच हुए लेन देन पर जीएसटी लग सकता है, यह तब होता है जब लेन-देन (रोजगार के संबंध) से बाहर होता है।

कर्मचारी को चार्ज की गई सुविधा: अगर नियोक्ता कर्मचारी को कोई सुविधा (जैसे हॉस्टल, कैंटीन भोजन) कम रेट पर देता है, और वह अमाउंट बाजार मूल्य के बराबर है, तो उस शुल्क पर जीएसटी लगा सकता है।

व्यक्तिगत संपत्ति की बिक्री: अगर कोई कर्मचारी अपने नियोक्ता को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति बेचता है, तो उस बिक्री पर जीएसटी लग सकता है (सिर्फ दोनों जीएसटी में रजिस्टार्ट होना चाहिए)।

मतलब बात यह है एक सामान्य मासिक वेतन (Basic Salary, HRA, DA) पर कभी भी जीएसटी नहीं लगता है।

सैलरी और GST का संबंध (डबल इनकम वालों के लिए)

यह भ्रम तब मन में आता है जब कोई व्यक्ति वेतनभोगी होने के साथ साथ फ्रीलांसिंग या कंसल्टेंसी की सर्विस भी देता है, यह भी एक टेबल से समझे:

इनकम का स्रोतजीएसटी के नियमआयकर का नियम
वेतनभोगी आय (Salary)जीएसटी फ्री।आयकर लगता है (TDS कटता है)।
फ्रीलांसिंग या कंसल्टेंसी (Service)GST लगता है इनकम (₹20 लाख के ऊपर होने के बाद)।इसमें आयकर लगता है (TDS भी कटता है, लेकिन ITR में व्यापार से आय से जमा होता है)।

आपकी सैलरी और आपकी फ्रीलांसिंग के इनकम को टैक्स के अंदर दो अलग अलग तरीके माना जाता है, आपको अपनी कंसल्टेंसी इनकम पर जीएसटी नियमों का पालन करना होता है, सैलरी पर नहीं।

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एक वेतनभोगी व्यक्ति को GST रजिस्ट्रेशन कब कराना होता है?

एक बात तो आप समझ चुके है कि सैलरी पर जीएसटी नहीं लगता, तो एक नौकरीपेशा व्यक्ति को जीएसटी कब लेना पड़ता है? आईए अब यह जानते है:

सेवाएँ बेचना: जब आपकी सैलरी के अलावा आपकी अन्य सेवाओं (जैसे कंसल्टेंसी, ट्यूशन) का सालाना टर्नओवर ₹20 लाख (या कुछ विशेष राज्यों में ₹10 लाख) से ज्यादा हो जाए।

माल बेचना: जब आप सैलरी के साथ साथ ऑनलाइन या ऑफलाइन माल बेचते हैं और टर्नओवर ₹40 लाख (या कुछ विशेष राज्यों में ₹20 लाख) से ज्यादा हो जाए।

अंतर-राज्यीय सप्लाई: जब आप अपनी फ्रीलांसिंग या कंसल्टेंसी सेवाएँ अपने राज्य से बाहर किसी को भी देते हैं, तो जीएसटी रजिस्ट्रेशन जरूरी हो जाता है, भले ही आपका टर्नओवर कम हो।

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निष्कर्ष: आपके सैलरी पर जीएसटी और टीडीएस के बारे में

अंत में आपको बताना चाहूंगा कि जब तक आप सिर्फ नौकरी करते हैं और आपकी एकमात्र इनकम सैलरी से आता है, तब तक आपको जीएसटी के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है।

सैलरी पर आपकी सिर्फ चिंता इनकम टैक्स का होना चाहिए, इसमें पहले आपका टीडीएस कटता है इसे एडवांस टैक्स भी कहते है, यह पैसा सरकार के पास जमा होता है, और साल के अंत में ITR फाइल करने के समय एडजस्ट कर सकते है।

में उम्मीद करता हूं कि आपको सैलरी पर जीएसटी और टैक्स के बारे में जानकारी मिली है, अपने दोस्त और सोशल मीडिया पर इस पोस्ट को शेयर कर उनको भी जानकारी लेने में मदद कीजिए।

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