E-Invoice vs Normal Invoice क्या अंतर है और ई-इनवॉइस बनाना कब जरूरी है?

E-Invoice और Normal Invoice दोनों ही जीएसटी सिस्टम में जरूरी डॉक्यूमेंट हैं, लेकिन इन दोनों के बीच का फर्क और इनके इस्तेमाल करने का सही समय हर बिज़नेस ऑनर को समझना चाहिए।

अगर आपका टर्नओवर बढ़ रहा है, तो हो सकता है कि अब आपको E-Invoice सिस्टम अपनाना पढ़े, आज हम इसी पर ही बात करेंगे इसलिए आप इस पोस्ट को लास्ट तक पढ़ें।

E-Invoice क्या होता है?

E-Invoice का मतलब होता है Electronic Invoice, यह एक डिजिटल इनवॉइस होता है जो जीएसटी पोर्टल के (IRP – Invoice Registration Portal) पर जनरेट और वेरिफाई किया जाता है।

इसमें हर एक इनवॉइस को IRN (Invoice Reference Number) दिया जाता है और QR Code के साथ प्रमाणित किया जाता है।

और यह इलेक्ट्रोनिक इनवॉइस जीएसटी पोर्टल और E-Way बिल सिस्टम से ऑटोमेटिक जुड़ जाता है, आपको कुछ करने के जरूरत नहीं होती है, नीचे से समझे।

जैसे किसी इनवॉइस को सीधे जीएसटी पोर्टल पर अपलोड नहीं किया जाता है, वल्कि आईआरपी पर अपलोड किया जाता है, इनवॉइस रजिस्ट्रेशन पोर्टल (IRP) से प्रमाणित होने के बाद दो काम करता है।

  1. यह डेटा आपके GSTR-1 रिटर्न को भर देता है।
  2. और ​यह आपके ग्राहक के GSTR-2A/2B को भी अपडेट कर देता है, जिससे आपके ग्राहक इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) जल्दी मिल जाता है।

Normal Invoice क्या होता है?

नॉर्मल इनवॉइस वह होता है जो खुद से बनाया जाता है लेकिन उसे सीधे जीएसटी पोर्टल पर अपलोड नहीं किया जाता, या किसी अकाउंट सॉफ्टवेयर से बनाया जाता है और JSON फ़ाइल के माध्यम से अपलोड करते है।

यह डेटा फ़ाइल करने की प्रक्रिया मासिक या त्रैमासिक होता है, नॉर्मल इनवॉइस में सेलर खुद इनवॉइस नंबर, जीएसटी डिटेल्स, ग्राहक का नाम, HSN और SAC कोड आदि लिखता है।

नॉर्मल इनवॉइस सिर्फ वही बिजनेस इशू कर सकता है जिसका टर्नओवर ई-इनवॉइस की लिमिट से कम है।

E-Invoice की अनिवार्यता किस बिजनेस को है?

ई-इनवॉइस किन बिजनेस को बनाना चाहिए यह भी आप जान लीजिए भारत सरकार ने ई-इनवॉइसिंग के लिमिट को स्टेप बाय स्टेप समय समय पर कम किया है, मतलब टर्नओवर के लिमिट से।

नीचे दी गई टेबल में आप जान सकते हैं कि किस वित्तीय वर्ष से कौन सी टर्नओवर टर्नओवर के लिमिट पर यह लागू हुई थी:

लागू होने के तारीखटर्नओवर के सीमा (₹)
1 अक्टूबर 2020₹500 करोड़ से अधिक
1 जनवरी 2021₹100 करोड़ से अधिक
1 अप्रैल 2021₹50 करोड़ से अधिक
1 अप्रैल 2022₹20 करोड़ से अधिक
1 अक्टूबर 2022₹10 करोड़ से अधिक
1 अगस्त 2023₹5 करोड़ से अधिक (यह वर्तमान सीमा है)

मतलब अभी अगर आपका सालाना टर्नओवर ₹5 करोड़ या उससे ज्यादा है, तो आपको ई-इनवॉइस बनाना अनिवार्य है।

यह ई-इनवॉइस बनाने का सालाना टर्नओवर लिमिट सरकार ने इसीलिए कम किया है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इनका इस्तेमाल करें और नॉर्मल इनवॉइस में होने वाले गलती को रोका जाए।

E-Invoice और Normal Invoice में मुख्य अंतर

ई-इनवॉइस बनाने से बहुत से चीज आसान और फ्रॉड से बचा जा सकता है, यह ई-इनवॉइस और नॉर्मल इनवॉइस में अंतर को आप एक टेबल से समझे:

तुलना बिंदुNormal InvoiceE-Invoice
तरीकामैनुअल या सॉफ्टवेयर से तैयार किया जाता हैंआईआरपी पोर्टल पर डिजिटल तरीके से होता हैं
Verificationकोई ऑनलाइन प्रमाणीकरण नहीं होता आईआरपी पोर्टल पर क्यूआर कोड और आईआरएन से वेरिफाई होता है
Integrationजीएसटी और ई-वे बिल से जुड़ा नहीं होतासीधे दोनों से जुड़ा होता है
Errors & Fraudगलतियाँ और फेक इनवॉइस बनने के संभव हैडेटा सिस्टम से वेरिफाई होता है
Speed & Accuracyमैनुअल फाइलिंग में समय लगता हैऑटो जीएसटी रिटर्न फाइलिंग में सुविधा होती है

E-Invoice के फायदे

वैसे तो ई-इनवॉइस बनाने का बहुत सारा फायदा है, कुछ तो ऊपर के टेबल से आप समझ गए होंगे, फिर भी कुछ और पॉइंट आपको में बताता हूं।

  1. बिलिंग और जीएसटी रिटर्न फाइलिंग को आसान बनाती है।
  2. ई-वे बिल अपने आप जनरेट हो जाता है।
  3. हमारे हाथ से होने वाली गलती और फ्रॉड की संभावना बहुत कम होती है।
  4. सरकार को रियल टाइम डेटा मिलता है।
  5. इनवॉइस पर विश्वास बढ़ती है।
  6. इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी का दावा) करते समय हिसाब में गड़बड़ी नहीं होती।

E-Invoice कौन नहीं बनाता?

कौन ई-इनवॉइस नहीं बनाने से भी चलेगा यह भी जान लीजिए, नीचे दिए गए संस्थान और सेक्टर को इनवॉइस बनाने से छूट दी गई है:

  1. Banking, Insurance, NBFC कंपनियाँ
  2. GTA (Goods Transport Agency)
  3. Passenger Transport Services
  4. Cinema Exhibition Services
  5. SEZ Units

ध्यान रखे: इनको सिर्फ ई-इनवॉइस बनाने की छूट है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह जीएसटी रिटर्न (जैसे GSTR-1) जमा करने या नॉर्मल इनवॉइस बनाने की जरूरत नहीं है।

इनको भी बाकी सभी नॉर्मल काम करना होगा सबके तरह और SEZ डेवलपर को ई-इनवॉइस से छूट नहीं है, सिर्फ SEZ यूनिट को है।

इस पोस्ट से जाने:- ITC Mismatch: क्या करें अगर GSTR-2B में आपके इनवॉइस नहीं दिख रहे हों?

E-Invoice कैसे बनाएं?

ई-इनवॉइस बनाने के कुछ सरल तरीके है नीचे के स्टेप से जान लीजिए:

  1. किसी भी अप्रूव्ड अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर पर इनवॉइस बनाएँ।
  2. उसे आईआरपी पोर्टल (https://einvoice1.gst.gov.in) पर अपलोड करें।
  3. आईआरपी पोर्टल इसे वेरीफाई करेगा।
  4. तब आईआरपी पोर्टल एक क्यूआर कोड और आईआरएन (QR Code and IRN) जनरेट करेगा।
  5. यही आपका डिजिटल ई-इनवॉइस होगा जिसे आप ग्राहक को दे सकते हैं।

E-Invoice की गलतियों से बचें

  • इनवॉइस नंबर में स्पेशल कैरेक्टर्स का इस्तेमाल न करें।
  • गलत HSN या GSTIN डालने से आईआरएन रिजेक्ट हो सकता है।
  • ई-इनवॉइस को सिर्फ 24 घंटे के अंदर ही कैंसिल किया जा सकता है।

इस पोस्ट से जाने:- GST में गलत इनवॉइस को कैसे कैंसिल करें या सुधारें? स्टेप बाय स्टेप गाइड

ई-इनवॉइस न बनाने के परिणाम

अगर आपका सालाना टर्नओवर ₹5 करोड़ से ज्यादा है और ई-इनवॉइस बनाना जरूरी होने के बाद भी आप इसका इस्तेमाल नहीं करते हैं, तो आपको जीएसटी कानून के नियम से कठोर दंड और जुर्माना भरना पड़ सकता है।

जब IRP द्वारा जेनरेट किया गया IRN और QR कोड हर इनवॉइस का कानूनी हिस्सा है, इसलिए इनके बिना इनवॉइस को गलत माना जाता है, इस पर भी जुर्माना लग सकता है।

और आपके ग्राहक को आपके द्वारा बनाए गए इनवॉइस के आधार पर इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) नहीं ले पाएंगे, इससे आपके ग्राहक को नुकसान होगा।

और वह भविष्य में आपसे डील करने से पीछे जाएंगे, असल में आपके व्यावसायिक संबंध खराब होंगे, इसीलिए सरकार के बनाए टर्नओवर लिमिट 5 करोड़ होने के बाद ई-इनवॉइस का इस्तेमाल करें।

इस पोस्ट से पूरा जाने:- जीएसटी में IRP (Invoice Registration Portal) क्या है? जानें ई-इनवॉइसिंग में इसका क्या रोल है?

ई-इनवॉइस के बारे में कुछ और बात

ई-इनवॉइस को जो IRN नंबर मिलता है वह IRP पोर्टल से जेनरेट किया गया 64 अंक का एक यूनिक नंबर होता है जो हर इनवॉइस के लिए अलग होता है।

और जो डिजिटल QR कोड मिलता है इस कोड में IRN, GSTINs, इनवॉइस नंबर, तारीख, और इनवॉइस वैल्यू जैसी सभी जरूरी जानकारी एन्क्रिप्टेड होती है।

यह कोई नया इनवॉइस फॉर्मेट नहीं है, बल्कि यह आपके अभी के इनवॉइस की इलेक्ट्रॉनिक कॉपी है, और यह टैक्स चोरी को कम करता है।

ई-इनवॉइस का असली उद्देश्य यह है कि सभी B2B (व्यवसाय से व्यवसाय) के इनवॉइस एक सिस्टम द्वारा प्रमाणित किया जाए, जब एक जगह से डेटा निकलेगा तो कोई धोखाधड़ी नहीं होगा।

जैसे इससे गलतियों में कमी होती है इन इनवॉइस के डेटा सीधे जीएसटी पोर्टल (GSTR-1) और ई-वे बिल में चला जाता है, जिससे खुद से किए गए डेटा एंट्री की गलतियाँ कम होती हैं।

जल्दी इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) मिलता है आपके सप्लायर द्वारा ई-इनवॉइस बनाने के तुरंत बाद आपका GSTR-2A/2B वह अपडेट हो जाता है, जिससे आईटीसी क्लेम करना आसान हो जाता है।

इस पोस्ट से जाने:- ITC का दावा क्या है और इसे कैसे करें? जानें इनपुट टैक्स क्रेडिट के नियम और GSTR-2B का महत्व

निष्कर्ष: ई-इनवॉइस और नॉर्मल इनवॉइस के बारे मैं

अंत में अब अगर आपका व्यवसाय ₹5 करोड़ से ऊपर है, तो अब नॉर्मल इनवॉइस की बजाय ई-इनवॉइस सिस्टम अपनाना बहुत जरूरी है।

ई-इनवॉइस से न केवल टैक्स नियम को आसान बनाता है, बल्कि आपके डेटा को सुरक्षित रखता हैं और सरकार से अप्रूव्ड भी होता है।

में उम्मीद करता हूं की आपको ई-इनवॉइस और नॉर्मल इनवॉइस में अंतर को जाना है, अपने दोस्त और सोशल मीडिया पर इस पोस्ट को शेयर कर उनको भी जानकारी लेने में मदद कीजिए।

इस पोस्ट से जाने:- GST में HSN और SAC Code कैसे चुनें? पूरा गाइड Turnover के हिसाब से

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